Thursday, September 2, 2010

अक्सर रुखी रातों में ......रानीविशाल















अक्सर रुखी रातों में
बेबस यादों के साए
जब मंडराते है
इधर उधर

तब दर्द मसकते
दिल के छाले
चटक चटक कर
फूटते है

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था

जू रिसने लगा हो
मर्म की मांद में
मेंह का पानी
जो सुख जाता है
झंझावात के बाद ही
छोड़ कर पत्थरों पर
कुछ मायूस से निशान

यूँ ही सिमट जाता है
दर्द और कशिश का ये रेला
खामोश और तनहा
तिमिर मिट जाने के बाद

बस छुट जाते है लकीर नुमा
बंज़र से निशान इनके
जो दिखाई नहीं देते
बस महसूस हुआ करते है .....

30 comments:

ओशो रजनीश said...

अच्छी पंक्तिया है .....

अपने विचार प्रकट करे
(आखिर क्यों मनुष्य प्रभावित होता है सूर्य से ??)
http://oshotheone.blogspot.com/2010/09/blog-post_07.html

ललित शर्मा-ললিত শর্মা said...

गहरी संवेदना से निकली हूई उत्तम कविता

आभार

'अदा' said...

तब दर्द मसकते
दिल के छाले
चटक चटक कर
फूटते है

काफ़ी जज्बाती लगी ये पंक्तियाँ...
अहसास से लबरेज़ लगी है कविता...
खूबसूरत..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत मार्मिक रचना ..

.तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था

एक टीस की लहर सी समां गयी ...

दीपक 'मशाल' said...

जू रिसने लगा हो
मर्म की मांद में
मेंह का पानी
जो सुख जाता है
झंझावात के बाद ही
छोड़ कर पत्थरों पर
कुछ मायूस से निशान

पूरी कविता ही एक नयापन लिए हुए है.. लेकिन जाने क्यों ये पंक्तियाँ बहुत ही ज्यादा सुन्दर लगीं..

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

दर्द को खूब शब्द दिए हैं आपने!
आभार.
आशीष
--
बैचलर पोहा!

Swarajya karun said...

संवेदनाओं से परिपूर्ण शब्द-चित्र दिल को
छू लेते हैं . सार्थक काव्य -लेखन के लिए हार्दिक
बधाई और शुभकामनाएं

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

रचना बहुत सुंदर है। रचना का पूर्वार्ध का शिल्प बहुत अच्छा है उस में गति और लय है। लेकिन उत्तरार्ध में वह टूटती प्रतीत होतीं हैं।

रश्मि प्रभा... said...

दर्द की तहरीरें किस तरह आती है , बहुत अच्छी तरह कहा-

arvind said...

तब दर्द मसकते
दिल के छाले
चटक चटक कर
फूटते है
..gahari samvedana jhalkti hai.

वन्दना said...

दर्द का मार्मिक चित्रण कर दिया।

Dr. Ashok palmist blog said...

रानी जी नमस्कार! गहरी संवेदना महसूस कराती एक लाजबाव रचना। बधाई! -: VISIT MY BLOG :- जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ।..............गजल को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।

Dr. Ashok palmist blog said...

रानी जी नमस्कार! गहरी संवेदना महसूस कराती एक लाजबाव रचना। बधाई! -: VISIT MY BLOG :- जब तन्हा होँ किसी सफर मेँ।..............गजल को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।

Udan Tashtari said...

दर्द उकेर दिया संवेदनशील कलम ने.

राज भाटिय़ा said...

दर्द ही दर्द है आप की इस खुब सुरत कविता मै, अति सुंदर भाव, धन्यवाद

महेन्द्र मिश्र said...

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था

बहुत ही भावपूर्ण रचना ...

JHAROKHA said...

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था--------------------------------------sundar aur behatareen panktiyan.ekdam man kochhoo lene vali.

Mrs. Asha Joglekar said...

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था >
दर्द को शब्दों में साकार कर दिया । बहुत सुंदर ।

महफूज़ अली said...

बहुत मार्मिक रचना ..

गिरीश बिल्लोरे said...

आज़ की कविता पूरी तरह मेरे इर्द गिर्द घूमती लगी
वाह क्या बात है

Mahak said...

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था

बस छुट जाते है लकीर नुमा
बंज़र से निशान इनके
जो दिखाई नहीं देते

बस महसूस हुआ करते है .....


बहुत ही उम्दा और सच्ची रचना ,मान गए ,ये पंक्तियाँ मुझे भी अपने बेहद करीब महसूस हुई हाल ही में हुए कुछ घटनाक्रमों की वजह से

ऐसे ही लिखती रहें ,आपका आभार

महक

सत्यप्रकाश पाण्डेय said...

बहुत अच्छी रचना,

अनुष्का के ब्लॉग पर प्रतिक्रिया देने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा इसलिए आपके ब्लॉग को माध्यम बनाकर अनुष्का के लिए :-

@अनुष्का
आपका ब्लॉग जगत में हार्दिक अभिनन्दन ।
आशा करता हूँ की लोगों को आपसे बहुत कुछ सीखने को मिलेगा, क्योंकि सीखने के लिए उम्र मायने नहीं रखती।

यहाँ भी पधारें :-
No Right Click

RAJWANT RAJ said...

nishan jo dikhai na de , bs mhsoos kiye jate ho to mashaallah uski seert kya khoob hogi . adbhut khyal behtreen prstuti .

RAJWANT RAJ said...

nishan jo dikhai na de , bs mhsoos kiye jate ho to mashaallah uski seert kya khoob hogi . adbhut khyal behtreen prstuti .

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

यूँ ही सिमट जाता है
दर्द और कशिश का ये रेला
खामोश और तनहा
तिमिर मिट जाने के बाद

बस छुट जाते है लकीर नुमा
बंज़र से निशान इनके
जो दिखाई नहीं देते
बस महसूस हुआ करते है .....
वाह...बहुत खूब...
सटीक शब्द...खास शैली...
कितना अच्छा लिखती हैं आप...
बधाई...
और ईद की शुभकामनाए.

usha rai said...

दर्द को उन रुखी रातों का बयाँ करना उस दर्द से होकर गुजरना है ! बड़े ही गहरे भाव हैं जिन्हें आपने खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है ! बहुत बहुत आभार !

love said...

aap bahot atchha likhti hai, if u free so visit my blog one time http://www.onlylove-love.blogspot.com

Asha said...

"वो दर्द का दरिया --------दबा हुआ था "|बहुत भाव पूर्ण लेखन के लिए बधाई |
आशा

अरुणेश मिश्र said...

वेदना को अच्छा स्वर दिया है ।

ताऊ रामपुरिया said...

बस छुट जाते है लकीर नुमा
बंज़र से निशान इनके
जो दिखाई नहीं देते
बस महसूस हुआ करते है .....


अत्यंत गहन अभिव्यक्ति, शुभकामनाएं.

रामराम.