Friday, September 17, 2010

विरक्ति पथ { भाग २ }-----------------------रानीविशाल

(अब तक : बचपन की प्रिय सहेलियाँ शची और शालिनी अचानक शोपिंग मॉल में शालिनी की बेटी मीसा के जरिये मिल जाती है । शची मॉल में ही मेनेजर है वो कई सालों के बाद शालिनी से मिली है । दोनों एक दुसरे को बहुत कुछ सुनना सुनना चाहती है इसीलिए बाकि का दिन हाफ डे लेकर शची शालिनी साथ साथ लंच लेकर शेष दिन साथ बिताने का तय करते है । दोनों मॉल से एक साथ निकल गए )

अब
आगे :
दोनों एक रेस्टोरेंट में जाते है । खाना आर्डर करने के बाद शालिनी खुद को रोक न सकी ......शची, इम्तहान के बाद एक दम कहाँ गायब हो गई थी तुम ? तुम्हे तो पता भी न होगा मैं तुम्हे कितना याद करती थी .....ना कोई ख़त न कोई फोन ! अपनी शादी का कार्ड देने तुम्हारे घर जब गई तो पता चला चाचाजी के देहांत के बाद सब लोग मुंबई चले गए । इम्तहान के तुरंत बाद हम लोग उंटी चले गए थे जब आए तो पता चला इतना कुछ हो गया ।
अपने पापा की याद आते ही शची की आँखें नम हो गई कही न कही उनकी मौत का जिम्मेवार वो खुद को ही समझने लगी थी ....हालाँकि माँ और भाई ऐसा बिलकुल नहीं मानते है ।
ये लीजिये आपका आर्डर मेम .....सर्व कर दूँ ? धन्यवाद हम ले लेंगे। {वेटर खाना रख कर चला गया ....}
दरसल शची की शादी कालेज के प्रथम वर्ष में ही हो गई थी । उसके पापा को २ दिल के दोरे पड़ने के बाद वो यही चाहते थे कि उनकी आँखों के सामने शची का घर बस जाए इसीलिए शची के मामा और मौसी ने मिलकर उसकी मौसी के ही रिश्तेदारों में एक रहिस खानदान के सुन्दर इकलौते बेटे से उसकी शादी कर दी । लड़का सुन्दर था । फिलोसोफी में पी. एच. डी कर रहा था और शची के भी आगे पढ़ने पर ससुराल में किसी को कोई आपत्ति नहीं थी । और क्या चाहिए..... सबने मिलकर जल्द से जल्द शादी कर दी । शची ने भी अपने माता पिता कि ख़ुशी को अपनी ख़ुशी मान उनके इस निर्णय को स्वीकार किया । अब शची वर्षभर अपने ससुराल में रहती और इम्तहान के ३-४ महीनो पहले अपने माईके चली आती । इम्तहान ख़त्म होते ही दुसरे दिन वो अपने ससुराल चली जाया करती थी । ऐसे ही पढ़ाई के ३ वर्ष बीते । लेकिन हाँ जब जब शची कालेज आती उसका अलग ही रुतबा होता ...एक तो उसका उजला रूप उस पर सिंदूर भरी मांग, आधे-आधे हाथों तक भरी चूड़ियाँ, महंगे महंगे कपड़े और उस पर उसकी डाइमंड की ज्वैलरी सारी सहेलियाँ आँखे फाड़ फाड़ कर देखा करती थी । शची और शालिनी में स्कुल के समय से ही प्रगाड़ मित्रता थी ....लेकिन शादी के बाद शची कुछ चुप चुप सी रहती थी । सब समझते थे रहिस घर में शादी होजाने पर शची घमंडी हो गई है लेकिन शालिनी के लिए तो वो हमेशा ही उसकी परम सखी रही ।
शालिनी समझती थी, कि शादी के बाद माहौल बदल जाने के कारण शची में ये बदलाव आया है .....वो अक्सर शची से उसके पति सिद्धार्थ के बारे में पूछा करती और शची सिद्धार्थ की बहुत प्रसंशा किया करती..... सिद्धार्थ बहुत पड़ा लिखा और बुद्धिमान है यही जान कर शची अपने पति के ज्ञान और इस रिश्ते का बहुत आदर करती थी
इधर मीसा अपना खाना ख़त्म कर शालिनी की गोद में सोजती है .....दोनों सखियाँ कुछ देर बाद वही पास एक पार्क में बैठ अपने सुख दुःख की बातें करती है ।
अपने पापा की याद में शची का चहरा एक दम भाव विहीन हो गया था
शालिनी भी दुखी हो गई लेकिन फिर शची को हिम्मत दिलाने लगी माहौल हल्का करने के लिए शालिनी शची से बोली और कहो जीजू कैसे है ? क्या यही दिल्ली में जॉब करते है ? उन्हें लेकर घर आना शची ...
शची अतीत से वर्तमान में लौट आई ...नहीं शालू मैं यहाँ एक शेयर्ड अपार्टमेन्ट में रहती हूँ ३ और लड़कियों के साथ
सब बहुत अच्छी है , वे भी जॉब करती है दरसल मैं पिछले महीने ही मुंबई से यहाँ आई हूँ ......लेकिन सिद्धार्थ जीजू ! {शालिनी बड़े आश्चर्य से पूछा....}
शची शालिनी के अचरझ को उसके चहरे पर देख रही थी ....धीमी आवाज में बोली अब हम साथ नहीं है

क्या ?? कब
से ?

इम्तिहान के बाद जब मैं ससुराल गई तो ..उल्टे पाँव ही आना पड़ा

लेकिन क्यों ? शालिनी ने तुरंत पूछा ......क्योंकि शालिनी अपने कन्धों पर उस रिश्ते का बोझ ढोने में कोई सार न था जिसका कोई अर्थ ही न हो मुझे सिद्धार्थ से कोई शिकायत नहीं शायद मेरा भाग्य ही ऐसा था ...लेकिन उस नाव की सवारी भी कोई कैसे करे जिसका कोई नाविक ही न हो , इसीलिए मैं लौट आई शालू
शालिनी तो ये सब सून स्तब्ध थी वो तो हमेशा से यही जानती थी की शची का वैवाहिक जीवन बहुत सुखी है
शादी के बाद सिद्धार्थ हमेशा अपने शोध कार्य में व्यस्त रहते मुझसे बात करने की उन्हें फ़ुरसत हि नहीं होती । रात रात भर लाइब्रेरी में किताबे पढ़ा करते
घर में सब उनके ऐसे सारा दिन शोध में लगे रहने पर खुश नहीं थे ...चिंता भी करते लेकिन उनके विचार जितना मैं समझी उनके चरित्र को लेकर सोचना व्यर्थ था मुझे लगा गृहस्थी में व्यस्त हो वो हम दोनों की पढ़ाई में बाधा नहीं डालना चाहते ....इसीलिए जी तोड़ मेहनत कर अच्छे से अच्छे अंक लाकर में उन्हें प्रभावित करना चाहती थी
कालेज के अंतिम वर्ष इम्तहान के बाद माँ का स्वस्थ्य ठीक न होने के कारण सास ससुर की आज्ञा से मैं परिणाम तक दिल्ली ही रुक गई माँ के स्वस्थ्य में सुधार हुआ और परिणाम भी निकल गए मेरी आशा के अनुरूप मैंने यूनिवर्सिटी में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये थे दुसरे ही दिन पापा और मैं मेरे ससुराल जाने के लिए निकल गए ...
क्रमश :

15 comments:

Vivek Rastogi said...

वाह क्या बात है...

और वैसे भी लड़कियाँ होती ही कुछ ज्यादा पढ़ाकू हैं..

कहानी अच्छी चल रही है... आगे इंतजार कर रहे हैं..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बढ़िया कहानी चल रही है ...आगे इंतज़ार है

संजय भास्कर said...

आगे इंतजार कर रहे हैं..

महफूज़ अली said...

पिछली सिरीज़ को पढ़ते हुए... कहानी अच्छी लग रही है... अब आगे का इंतज़ार है... जितनी अच्छी आप कविता कर लेतीं हैं... उतनी ही अच्छी पकड़ आपकी कहानी पर भी है....

Arvind Mishra said...

अब आगे !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

अच्छा लेखन.

ताऊ रामपुरिया said...

कहानी का प्रवाह बहुत सुंदर बन गया है, आगे का इंतजार है.

रामराम.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

कथा बहुत ही रोचक है!
--
आगे का इन्तजार है!

Shah Nawaz said...

वाह! बेहतरीन है.... आगे की कड़ियों को पढने की उत्सुकता बढ़ रही है.


व्यंग्य: युवराज और विपक्ष का नाटक

वाणी गीत said...

रोचक रहा यह भी ...उत्सुकता बनी हुई है ...!

Udan Tashtari said...

होती हैं कि लगती है ज्यादा पढ़ाकू...कौन जाने..मगर कथा प्रवाह में है..जारी रहो...

Swarajya karun said...

देखें, कहानी आगे किस मोड़ तक हमें ले जाएगी !

Dr.R.Ramkumar said...

कथा रोचक है!
--
इन्तजार है!

काजल कुमार Kajal Kumar said...

चलिए मेरी प्रतिक्रिया भी क्रमश: रही :)

गिरीश बिल्लोरे said...

आज़ प्रभाव शाली रही कहानी