
कैसा मंज़र है, ये क्या गज़ब नज़ारा है
दर्द का दरिया, और दिल गमों का मारा है
इतने तनहा है की, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
ठोकरें खा कर, ज़माने की ना घायल हम है
वो तो अपने थे, जिनके बोलो ने हमको मारा है
महफ़िल में अपनो की, तो हरदम रुसवाई मिली
साथ गैरो का ही, अब तो दिल को प्यारा है
टूट कर बिखरे भी, 'रानी' तो क्या ग़म है
टूटे तारों ने, तो किस्मतों को सवाँरा है
30 comments:
बहुत अच्छी कविता।
हिन्दी का प्रचार राष्ट्रीयता का प्रचार है।
टूट कर बिखरे भी,'रानी' तो क्या ग़म है
टूटे तारों ने, तो किस्मतों को सवाँरा है।
वाह-वाह,बहुत बढिया आभार
खोली नम्बर 36......!
बहुत सुन्दर कविता……
बेहतरीन ग़ज़ल| मकता कमाल का है .......दिल से मुबारकबाद|
ब्रह्मांड
कैसा मंज़र है, ये क्या गज़ब नज़ारा है
दर्द का दरिया, और दिल गमों का मारा है
...vaah bahut sundar ghajal.
क्या बात है रानी जी !
गज़ब की ग़ज़ल...
*
टूट कर बिखरे भी,'रानी' तो क्या ग़म है
टूटे तारों ने, तो किस्मतों को सवाँरा है।
*
अहाहा ! मज़ा आया
उफ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ्फ!!! इतना खुबसूरत एहसास और ई गालिबाना अंदाज़... मन मिजाज खुस हो गया पढकर.
ठोकरें खा कर, ज़माने की ना घायल हम है
वो तो अपने थे, जिनके बोलो ने हमको मारा है
महफ़िल में अपनो की, तो हरदम रुसवाई मिली
साथ गैरो का ही, अब तो दिल को प्यारा है..
दर्द को बयाँ करते हुए भी एक सकारात्मक सोच बहुत अच्छी लगी ....
खूबसूरत गज़ल..
महफ़िल में अपनो की, तो हरदम रुसवाई मिली
साथ गैरो का ही, अब तो दिल को प्यारा है
Apno se to sabhee pyaar kar lete hain..gairon ko apnana ..
Great writeup !
बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति...उत्तम प्रस्तुति.....बधाई.
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'शब्द सृजन की ओर' में 'साहित्य की अनुपम दीप शिखा : अमृता प्रीतम" (आज जन्म-तिथि पर)
इतने तनहा है की, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
जब अंधेरे का सहारा मिलता है तो रोशनी की मंज़िल मिल ही जाती है।
टूट कर बिखरे भी, 'रानी' तो क्या ग़म है
टूटे तारों ने, तो किस्मतों को सवाँरा है ...
लाजवाब ग़ज़ल ..... और इस शेर के तो क्या कहने .... सच है टूटे तारों में इंसान किस्मत देखता है .....
इतने तनहा है की, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
ख़ूबसूरत अभिव्यक्ति....आभार
इतने तनहा है की, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
क्या नाम दें - आप ही बताइए...... कविता या नज़्म : मुझमे इतनी क्षमता नहीं........
पर बहुत ही अच्छी है.
बहुत अच्छी कविता।
बहुत सुंदर रचना.
रामराम
टूट कर बिखरे भी,'रानी' तो क्या ग़म है
टूटे तारों ने, तो किस्मतों को सवाँरा है।
-वाह! क्या बात है! उम्दा!
बहुत सुंदर कविता जी, धन्यवाद
कैसा मंज़र है, ये क्या गज़ब नज़ारा है
दर्द का दरिया, और दिल गमों का मारा है
वाह...
इतने तनहा है कि, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
मायूसी से भरा....
लेकिन दिल को छूने वाला शेर.
बहुत अच्छी कविता..... उत्तम प्रस्तुति.....बधाई.
रानी जी!लगता है आप गजल लिखी नहीं हैं,ईसब आपने जी कर देखा है..जब दिल से लगा है तब जाकर गजल बना है..बहुत सुंदर!!
बहुत सुन्दर.............
टूटे हुए तारों ने किस्मत को सँवारा है।
मिल जाये खुशी उनको, ग़म हमको गँवारा है।।
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काव्य तरंग की चर्चा तो चर्चा मंच पर भी है!
अच्छी पंक्तिया है ......
http://thodamuskurakardekho.blogspot.com
ठोकरें खा कर, ज़माने की ना घायल हम है
वो तो अपने थे, जिनके बोलो ने हमको मारा है
दर्द तो हमेशा अपने ही देते हैं। बहुत अच्छी लगी कविता। शुभकामनायें
रानी जी नमस्कार! बहुत ही लाजबाव कविता हैँ। प्रत्येक शब्द दिल को छू गया हैँ। शुभकामनायेँ! -: VISIT MY BLOG :- गमोँ की झलक से जो डर जाते हैँ।...........गजल को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप इस लिँक पर क्लिक कर सकती हैँ।
bahot achchi lagi.
बहुत सुन्दर,
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अकेला या अकेली
महफ़िल में अपनो की, तो हरदम रुसवाई मिली
साथ गैरो का ही, अब तो दिल को प्यारा है
बेहतरीन ग़ज़ल.बधाई.
इतने तनहा है की, परछाइयों से डरते है
अब तो बस दिल को, अंधेरों का ही सहारा है
लाजवाब शेर...
बढ़िया ग़ज़ल!
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