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Thursday, September 2, 2010

अक्सर रुखी रातों में ......रानीविशाल















अक्सर रुखी रातों में
बेबस यादों के साए
जब मंडराते है
इधर उधर

तब दर्द मसकते
दिल के छाले
चटक चटक कर
फूटते है

तब टिप टिप कर
रिसने लगता है
वो दर्द का दरिया
जो छुपा हुआ था
तपस आलोक में
जो कई तहों में
दबा हुआ था

जू रिसने लगा हो
मर्म की मांद में
मेंह का पानी
जो सुख जाता है
झंझावात के बाद ही
छोड़ कर पत्थरों पर
कुछ मायूस से निशान

यूँ ही सिमट जाता है
दर्द और कशिश का ये रेला
खामोश और तनहा
तिमिर मिट जाने के बाद

बस छुट जाते है लकीर नुमा
बंज़र से निशान इनके
जो दिखाई नहीं देते
बस महसूस हुआ करते है .....