
बन बैठा इंसान दरिंदा, तौबा इसकी बुरी नज़र ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
नर्क बना रहे जीवन इनका, इज्जत को इनकी छीन कर ।
ये भी माँ, बहन, किसी कि बेटी है, खुद अपने घर में डाल नज़र ।।
ना भरोसा आस पड़ोस का, ना बचा यकीन किसी रिश्तेदार पर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
औरत के बदन मैं बस, उसकी इज्जत ही सांसे लेती है ।
दो मुक्ति भय से इसको भी, क्यों डरी डरी ये रहती है ।।
भय भरा है मन में दरिंदो का, स्वछंद भ्रमण अधिकार दो ।
ये विश्व सृजन की भागी है, इसे इज्जत दो सत्कार दो ।।
कोलेज , बस्ती में जीना मुश्किल, छेडी जाती है हर गाँव शहर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।
उन्नति की ये पहचान है, इसे पढ़ना आगे बड़ना है ।
पापी इसके प्रतिकार से डर, बिन मौत तुझे क्यों मरना है ।।
ना इसका सीना छलनी कर, ऐसी ओछी दुराचारी कर ।
इसने ही रचा है तुझको भी, ना खुद ईश्वर से गद्दारी कर ।।
हर देश सदा आगे बड़ पाया, एक शुद्ध समाज की नीव पर ।
कहाँ कहाँ बच पाएगीं लड़कियां, हर जगह इन्हें लुटेरों का डर ।।