Friday, February 19, 2010

ना आए विरह की रैन




दो नयना मिल दो से चार हुए, ना सूझे कोई और
जो
तुम सुध आकर लो मेरी, मैं यह दुनिया दू छोड़

धरती मचले प्यास से, बादल का ना कोई निशान
चंचल मन हुआ बावरा, तुम बिन देह हुई निष्प्राण


कोयल कूहके बाग में, पपीहे ने मचाया शोर
ऋतु पर भी यौवन चड़ा, पर ना नाचे मन का मोर


लगे है चन्दन आग सा, पुरवाई चुभोए शूल
मैं जोगन बन राह तकू, पियुजी गए तुम मुझको भूल


चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा


तुम बिन सब सुख दुःख भये, ना पाए मन कहीं चैन
प्राण जाए तो जाए पर, ना आए विरह की
रैन.....ना आए विरह की रैन !!


31 comments:

Arvind Mishra said...

सचमुच विरह की रैन कितनी पीड़ा भरी होती है और वह भी वसंत ऋतु में
भावों -भावनाओं की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति

Unknown said...

बहेतरीन रचना ......

दीपक 'मशाल' said...

Rani ji.. kripya bura na manen.. aaj kai kamiyaan hain rachna me. abbal to shabd theek kar lijiye warna abhi Girijesh ji aate hi honge.. :)

स्वप्न मञ्जूषा said...

virah ki vedna ko bhali bhanti bata gayi yah rachna..
sundar..

स्वप्न मञ्जूषा said...

virah ki vedna ko bhali bhanti bata gayi yah rachna..
sundar..

Kusum Thakur said...

विरह वेदना का सुन्दर वर्णन !!

Kusum Thakur said...

विरह वेदना का सुन्दर वर्णन !!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

सुन्दर भाव!

विवेक रस्तोगी said...

ना आए विरह की रैन !!

बहुत सुन्दर चित्रण विरह् का, हम जानते हैं, क्योंकि हम झेल रहे हैं :(

Randhir Singh Suman said...

nice

संतोष त्रिवेदी said...

दूर देश में बैठ कर करती हैं संवाद'
होली अपने देश की ,आती होगी याद !

निर्मला कपिला said...

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा
कविता मे सज कर विरह भी इतनी सुन्दर हो सकती है आज जाना । बहुत सुन्दर कविता है बधाई

Udan Tashtari said...

विरह प्रधान ऐसे गीत आजकल कम पढ़ने सुनने में आते हैं, बधाई आपको!

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर भाव और सशक्त रचना.

रामराम.

डॉ. महफूज़ अली (Dr. Mahfooz Ali) said...

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा


बहुत सुंदर पंक्तियाँ....... मन मोह मोह लिया इस रचना ने....


आभार....

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आदाब
काव्य की विभिन्न विद्याओं में नित नये प्रयास की कड़ी में एक सफ़ल रचना का सृजन.

Arshad Ali said...

बिरह शब्द जिससे प्रेमी डरेंगे ..
कारण आपकी कविता में उस बेचैनी का प्रस्तुति जो इतनी सटीक है की क्या कहने..
तुम बिन सब सुख दुःख भये, ना पाए मन कहीं चैन
प्राण जाए तो जाए पर, ना आए विरह की रैन..
सौ प्रतिशत सहमत.

Rajeysha said...

नारी सुलभ भावनाओं की सुन्‍दर सचि‍त्र अभि‍व्‍यक्‍ि‍त

vandan gupta said...

bahut hi sashakt abhivyakti.

M VERMA said...

प्राण जाए तो जाए पर, ना आए विरह की रैन
वाकई विरह की रैन तो मृत्यु से भी भयानक है.
सुन्दर रचना

डॉ. मनोज मिश्र said...

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा ..
vaah.sundr.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत कोमल शब्दों में विरह की पीड़ा को दर्शाया है....और चित्र भी सुन्दर हैं....

Unknown said...

आपकी रचना बेहद सुंदर बनी पड़ी है, बिरह का दर्द जीवंत नजर आ रहा है। कल क्लिक किया था, आपका नाम पढ़कर रानी विशाल। ब्लॉग को पढ़ नहीं पाया था, किसी कारण वश। इसको बहाना न जानिएगा।

चलते चलते "बिरह तो प्रेम को और मजबूत करता है, बिन बिरह प्रेम के अर्थ समझना भी मुश्किल सा लगता है"।

Akhilesh pal blog said...

bahoot sundar aapke blog par aakar kusee huyee achha laga

अजय कुमार झा said...

वाह बहुत ही सुंदर विरह रचना ,
आपको पढना अब आदत बनती जा रही है तो इसमें कोई आशचर्य नहीं है ....लिखती रहें ..शुभकामनाएं

अजय कुमार झा

पूनम श्रीवास्तव said...

रानी जी, कविता में विरह का वर्णन करना बहुत ही दुरूह कार्य है।लेकिन आपने इतनी सहजता और खूबसूरती से इसे अंजाम दिया है-----बहुत बढ़िया लगी आपकी यह रचना। पूनम

मनोज कुमार said...

चंद्रप्रभा से रात सजी, तारो ने जमाया डेरा
सिसक विरह में रात कटी, असुवन में हुआ सवेरा

कविता इतनी मार्मिक है कि सीधे दिल तक उतर आती है।

ब्लॉ.ललित शर्मा said...

रानी विशाल जी-
आप बढिया लिखती है,
बसंत ॠतु मे विरह का भाव
बड़ी कोमलता से प्रस्तुत किया
आभार

Yogesh Verma Swapn said...

virah ka ati sunder chitran.

रश्मि प्रभा... said...

लगे है चन्दन आग सा, पुरवाई चुभोए शूल
मैं जोगन बन राह तकू, पियुजी गए तुम मुझको भूल
.........
विरह वर्णन बहुत ही अच्छे से किया......

संजय भास्‍कर said...

कविता मे सज कर विरह भी इतनी सुन्दर हो सकती है आज जाना । बहुत सुन्दर कविता है बधाई