Friday, January 22, 2010

मैं एक नारी

यह कॉलेज के जमाने की लिखी एक पुरस्कार अर्जित कविता हैं । जिस पर श्रेष्ठ विद्वानों की सराहना प्राप्त करने का अवसर मिला था । आज यही रचना आपने ब्लॉग जगत के मित्रो से बाटना चाहती हूँ ।
महाकालीरूपा, दुर्गा स्वरूपा
चामुंडा भी हूँ, मैं नर्सिहनी
ज्वालामुखी सी ज्वाला मुझमे
विद्रोह का है, लावा मन में
अत्याचारों से लड़ने की
अब मुझमे भी शक्ति हैं
मैं भी कुछ कमज़ोर नहीं
ये मेरी ही अभिव्यक्ति हैं
मैं कभी त्याग की प्रतिमा
भी बनकर रही थी
सुकोमलता, सहनशीलता
से ही मैं सजी थी
पर दुष्टता को रास ना आया
ये मेरा स्वरूप
शोषण कर मेरा इसने
मुझे लुटा हैं, खूब !!
आगे मुझे ही बड़ना पड़ा
हक़ के लिए भी, लड़ना पड़ा
अब वीरता की प्रतिमा हूँ मैं
सुविशाल ह्रदय, एक माँ हूँ मैं
विष्णु की लक्ष्मी, शिव की उमा हूँ
शिक्षित घरो की मैं ही शुशमा हूँ
शर्म से छुपा बदली में चन्द्र वो आधा हूँ
राम की सीता और कृष्ण की राधा हूँ
आज भी मुझमे बसी दया व ममता हैं
किंतु अत्याचारों से लड़ने की
कड़ी क्षमता हैं ......

14 comments:

मसिजीवी said...

वाकई ये तो कॉलेज के जमाने की कविता है :)
शुक्रिया साझा करने के लिए

'अदा' said...

naari ke vibhinn roopon ko bahut acchi tarah uker diya aapne apni kavita mein..nisandeh yah kavita puraskaar ke yogy hai..
badhaii..

निर्मला कपिला said...

सुन्दर रचना है शुभकामनायें

अविनाश वाचस्पति said...

बधाई कॉलेज वाली
क्‍योंकि
रचना है कॉलेज वाली।

शब्‍द पुष्टिकरण निष्क्रिय कीजिएगा।

महफूज़ अली said...

बहुत सुंदर......

अनिल कान्त : said...

ek achchhi kavita padhne ko mili

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों के साथ अनुपम रचना के लिये बधाई ।

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब रानी दीदी क्या बात है, बहुत बढिया लगा पढकर ।

Arvind Mishra said...

शक्ति स्वरूपा नारी -ओज की कविता !
काव्य मंजूषा का स्वागत है !

JHAROKHA said...

रानी जी,
सप्रेम नमस्कार।
आपका मेरे ब्लाग पर आना मुझे बहुत अच्छा लगा। आपकी रचनायें तो काबिले तारीफ़ हैं। ब्लाग पर आप अपनी रचनायें लिखती रहें।
मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं।
पूनम

दिगम्बर नासवा said...

खूबसूरत शब्दों से पिरोइ है यह रचना ..... दिलों में जोश का संचार करती ...... अच्छी रचना ..........

Amitraghat said...

आपका ब्लॉग देखा/पढ़ा,यूं तो सारी कविताएं एक दूसरी से अलग हैं, पर फिर भी "मैं एक नारी हूं" सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसमे जोश है,एक प्रवाह है,सहज है,सौम्य है
। भाषा आपकी भोली-भाली है,कुछ कविताएँ
छायावाद युग की याद दिलाती हैं कुछ ईश्वर को ढ़ूँढ़ती हैं तो कुछ खुद को। शुभकामनाएँ

प्रणव सक्सैना

संजय भास्कर said...

रानी जी,
सप्रेम नमस्कार।
आपका मेरे ब्लाग पर आना मुझे बहुत अच्छा लगा। आपकी रचनायें तो काबिले तारीफ़ हैं। ब्लाग पर आप अपनी रचनायें लिखती रहें।
मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं।

संजय भास्कर said...

मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं।