Friday, January 8, 2010

ये दुनिया क्या है

एक भौर मैं भाव विभौर हो सोच रही थी ।
ये दुनिया क्या है? इसका उत्तर खौज रही थी ।।

मैंने अपने दिल से बोला तू बतलादे ।
सच्चाई का दर्पण मुझको तू दिखालादे ।।

दिल ने बोला दुनिया है सपनों का मैला ।
प्रलय काल तक जंहा चले है , प्रेम का खेला ।।

इस उत्तर से मन को तो संतुष्टि नहीं हुई ।
जो सच सुनना चाहा उसकी पुष्टि नहीं हुई ।।

चलते चलते देखा इक मैदान बड़ा था ।
जिसके बिच एक सुखा पेड़ खड़ा था ।।

पुष्प-पत्र विहीन यह छीन भिन्न ।
इसने कितनी ही विपदाओ को सहा होगा ।।

आज ऐसा है ये , मगर पूर्व में;
ये भी हरा भरा रहा होगा ।।

ये जीवन है, जीवन का दस्त्तुर यही है ।
सुख यही पर है तो, दुःख भी तो भी तो यही है ।।

कोई हसता है, कोई रोता है ।
कोई पता है, कोई खोता है ।।

कोई मिलाता है, कोई बिछड़ता है ।
कुछ बनता हैकुछ बिगड़ता है ।।

यह सच है की दुनिया बड़ी संघर्षमयी है ।
ये मैंने ही नहीं बड़े पुरखो ने भी कही है ।।

सारी शक्ति और उर्जा का तंत्र यही है ।
"विशवास रखो संघर्ष करो" बस मंत्र यही है ।।

4 comments:

संजय भास्कर said...

BEHTREEN RACHNAA..

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर भाव लिये हुये अनुपम प्रस्‍तुति ।

KEDAR JOSHI said...

BEAUTIFUL.KEEP IT UP....(FEAR IS THAT DARK-ROOM WHERE NEGATIVES ARE DEVELOPED....AASHA HI JEEVAN HAI AUR ISI KA NAM DUNIYA HAI!)....

वेदिका said...

बहुत सुंदर व दमदार रचना