Wednesday, February 3, 2010

हम आंसू पीकर जीते है



हम आंसू पीकर जीते है
बस आंसू पीकर जीते है
फूल हटा कर कांटे दे दे
ये इस दुनिया की रीते है

हम आंसू पीकर जीते है

कहने को तुम कुछ भी कह लो
सारे काम हम करते है
रोज़ सुबह को जीते है
और रोज़ शाम को मरते है

हम आंसू पीकर जीते है

पल पल दिन का याद करे
जब सर तकिये पर धरते है
करना चाहा वो कर ना सके
ये सच कहने से डरते है

हम आंसू पीकर जीते है

छोड़ दिया जब तुझको हमने
फिर क्यों आहें भरते है
बस तेरा मेरा प्यार नहीं इक
दुनिया में और भी प्रीते है

हम आंसू पीकर जीते है
बस आंसू पीकर जीते है

18 comments:

Suman said...

हम आंसू पीकर जीते है
बस आंसू पीकर जीते है nice

Manoj Bharti said...

छोड़ दिया जब तुझको हमने
फिर क्यों आहें भरते है
बस तेरा मेरा प्यार नहीं इक
दुनिया में और भी प्रीते है

दुख में सुख ढ़ूँढ़ती एक सुंदर कविता ।

Udan Tashtari said...

हम आंसू पीकर जीते है
बस आंसू पीकर जीते है

बेहतरीन रचना, बधाई.

Mithilesh dubey said...

बेहतरीन भावो के साथ उम्दा अभिव्यक्ति , बहुत खूब ।

Arvind Mishra said...

बहुत भावपूर्ण रचना !

महफूज़ अली said...

सुंदर शब्दों के साथ..... भावपूर्ण व गहन रचना ....

आभार...

'अदा' said...

acchi lagi tumhaari rachna..

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍द रचना, बधाई ।

अजय कुमार said...

जिंदगी की जद्दोजहद

विचारों का दर्पण said...

बहुत बेह्तरीन प्रस्तुति ...

निर्मला कपिला said...

जो आँसू पी कर जी गया समझो उसने ज़िन्दगी को जान लिया और जीत लिया बहुत सुन्दर रचना है बधाई

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी कविता।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

रानी विशाल साहिबा, आदाब
.....रोज़ सुबह को जीते है
और रोज़ शाम को मरते है
हम आंसू पीकर जीते है...
जीवन तो इसी का नाम है.

M VERMA said...

फूल हटा कर कांटे दे दे
ये इस दुनिया की रीते है
जी हाँ दुनिया की रीत तो यही है
सुन्दर रचना

Razi Shahab said...

छोड़ दिया जब तुझको हमने
फिर क्यों आहें भरते है
बस तेरा मेरा प्यार नहीं इक
दुनिया में और भी प्रीते है

हम आंसू पीकर जीते है
बस आंसू पीकर जीते है
sundar ati sundar

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत सुंदर रचना, शुभकामनाएं.

रामराम.

amritwani.com said...

kya sab pite he aasu

Pushpa Bajaj said...

आप कहते हैं :

कहने को तुम कुछ भी कह लो
सारे काम हम करते है
रोज़ सुबह को जीते है
और रोज़ शाम को मरते है

हम कहते है :

दर्द का समाया

बेवजह ही आया

सांसे हम ले खुलकर

हर जगह रौशनी का साया