Tuesday, March 2, 2010

विकास नहीं गुलामी की सिड़ी है GMO......प्रकृति के साथ छेड़ छाड़ विनाश की द्योतक {Bt brinjal}

ज़रा सोचिये आज से कई साल पहले जब पारम्परिक खेती की जाती थी तब कभी आपने सुना था किसी को कहते की हमें टमाटर से एलर्जी है या सोयाबीन या फिर मूंगफली से एलर्जी है ?? शायद नहीं । हाँ, लेकिन आज कल सभी को यह कहते जरुर सुनते है कि अब फल, सब्जियों और अनाज में पहले जैसा स्वाद नहीं रहा....और इसी के साथ तरह तरह की एलर्जिस भी अस्तित्व में आई है । लेकिन इसके ज़िम्मेदार हम खुद है । रासायनिक उर्वरक, केमिकल्स के प्रयोग ने जहाँ उत्पादन को बढाया वही दूसरी तरफ ढेरो नुकसान भी दिए है । मृदा की उर्वरकता तो कम हो ही गई रासायनिक तत्वों के प्रयोग से उत्पादन की गई फसलों में पोषक तत्वों की भी बहुत कमी आई है । लेकिन इतने पर भी हम सुधारने को तैयार नहीं है ।
भारत में भ्रष्टाचार ने तो ऐसी जड़े जमाई है कि कोई भी उत्तरदायी पदाधिकारी या नेता अपने लाभ के सिवा कुछ और सोचने को ही तैयार नहीं है । एसे में देश का भविष्य तो गर्त में जाएगा ही । विकास के नाम पर सरकार एक नया फंडा लेकर आई है । कृषि उत्पादन बढ़ाने का GMO (genetically modified organisms) मतलब अनुवांशिक रूप से संशोधित बीजों द्वारा फसल उत्पादन । जिसमे बीज के मूल स्वरूप में रूपांतरण कर अलग बीज बनाया जाता है । जिसकी फ़लस उसके मूलस्वरूप से बेहतर होती है । ऐसा कहना है.... आनुवंशिक अभियांत्रिकी इंजीनियरों का जिन्होंने ये बीज बनाए है, उन कंपनियों का जो ये बीज बेच रही है, और हमारी भ्रष्ट सरकार का जो इनका प्रचार प्रसार हिन्दुस्तान में कर रही है । किन्तु वास्तविकता यह है की इनसे बनी फसलें स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है या नहीं ये अब तक सत्यापित ही नहीं हुआ है, जोकि ये बीज बनाने वाली कंपनियों का परम दायित्व है । दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात इन बीजों का पेटेंट ये कम्पनियां लाभकमाने के लिए पेटेंट कर किसानो का शोषण करने के लिए के दोषी हैं। पेटेंट बीज का उपयोग करने वाले किसान अगली फसल के लिए बीज को बचा नहीं सकते हैं, जिससे उन्हें हर साल नए बीज खरीदने पड़ते हैं। चूँकि विकसित और विकास शील दोनों प्रकार के देशों में बीज को बचाना कई किसानों के लिए एक पारंपरिक प्रथा है, GMO बीज किसानों को बीज बचाने की इस प्रथा को परिवर्तित करने और हर साल नए बीज खरीदने के लिए मजबूर करते हैं। वर्तमान में, दस बीज कम्पनियां, पूरी दुनिया की बीज की बिक्री के दो तिहाई से अधिक भाग का नियंत्रण करती हैं। इन कंपनियों के पास अपने बीज का बौद्धिक स्वामित्व है, उनके पास अपने पेटेंट उत्पाद की शर्तें और नियम लागू करने का अधिकार है । मतलब इनके जरिये हम फिर से गुलामी की ही सीड़ियाँ चढ़ने जारहे है और ऐसा करने वाले लोग हमारे अपने ही है.....हमारी सरकार है । विकसित देशो में इन कंपनियों ने अपने ऐसे पैर पसारे है कि किसानो कि जान पर आन पड़ी है । पेटेंट के कारण अगर आपके खेत में इन बीजों से उगने वाली फ़सल है मतलब कानून के हिसाब से आपको पेटेंट धारक कंपनी को रकम अदा करनी पड़ेगी । अब बताइए भला अगर बगल वाले किसान ने यह बीज बोया हवा तो उड़ा कर आपके खेत तक लाएगी ही तो तुरंत ये पेटेंट धारक महाराज आपसे पैसे लेने पहुच जाएँगे जबकि आपने तो बीज ख़रीदे ही नहीं और कानून भी आपकी मदद नहीं कर सकता । आपको सोच कर हँसी तो आई ही होगी .....अब अगर मैं यह कहूँ कि ऐसे मामले वाकई में हो चुके है तो आपको भारतीय कृषि पर मंडराते संकट का आभास अच्छी तरह से हो गया होगा ।
Bt brinja(Bacillus Thuringiensis Brinja) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । बी टी ब्रिन्जेल......बैंगन के बीज को अनुवांशिक रूप से परिवर्तित कर भारत की नंबर वन बीज की कंपनी (Mahyco) ने अमेरिकन मल्टीनेशनल (Monsanto) के योगदान व सहयोग से ये बीज तैयार किया है । जो की खरपतवार कीट तथा अन्य कीड़े स्वयं ही नष्ट कर देता है । जरा सोचिये की जो बीज छोटे छोटे अन्य जीवो के लिए इतना हानिकारक है उसका इंसान के शरीर पर क्या प्रभाव पड़ेगा ?? वैज्ञानिको का कहना है फेफड़ो व किडनी को यह बहुत नुकसान पंहुचा सकता है । उसके बाद भी इसका समर्थन किया जारहा है । अब सबसे खतरनाक पहलू इस बीज का यह है...अपनी समझ के हिसाब से सरल शब्दों में बताऊ तो, फ़सल के अलावा सब कुछ नष्ट कर देना । लेकिन क्या हुआ फ़सल तो सुरक्षित रहेगी न वो भी कम झंझट के, यही कहेंगे इसके एवज में दलीले देने वाले मगर आप ही सोचिये क्या होगा नाइट्रोजन ग्रहण करने वाले बेक्टेरिया का या किसान के सबसे बड़े मित्र केचुए का ?? बेहतर पैदावार के लालच में पर्यावरण से कितना बड़ा खिलवाड़ करने चले है हम !! किसान भी पूरी तरह से इन कंपनियों के शिकंजे में फस जाएंगे । मतलब कही से कही तक इसमे भलाई नहीं है । इस तरह GMO बहुत बड़ा संताप बन सकता है कृषि के लिए । जानकारी और ज्ञान के आभाव में गरीब अशिक्षित किसान इनका प्रयोग कर सकते है या करने के लिए बहकाए जा सकते है । उसकी कल्पना मात्र से चिंता होने लगाती है । प्रकृति के मूल स्वरूप से छेड़ छाड़ करने के पूर्व में भी भयंकर परिणाम हम भुगत चुके है या कहे भुगत रहे है । सच्ची बात यही है कि सरकार का यह फंडा किसानो के गले का फंदा बन सकता है ।
अमेरिका और इसके जैसे कई विकसीत देशो का आर्थिक ढांचा मल्टीनेशनल कंपनीस पर टिका हुआ है । इसलिए निश्चित तोर पर इन देशो में इन कंपनियों का वर्चस्व बहुत अधिक है । लेकिन भारत जैसे विकासशील देश की अर्थव्यवस्था में कृषि की भी महत्वपूर्ण भूमिका है । यहाँ की बहुत बड़ी जनसँख्या किसी न किसी तरह से कृषि से जुड़ी हुई है ऐसे में भ्रष्ट नेता इन कंपनियों से पैसा खाकर उनका ही ढोल बजा रहे है । और फिर स्वास्थ को प्राथमिकता दी जाए तो भी यह सुरक्षित नहीं है । इनके उपयोग के परिणाम स्वरूप भयंकर विलक्षण बीमारियाँ अस्तित्व में आने की आशंका बहुत ज्यादा है । हाल ही में मध्यप्रदेश में कॉटन फेक्टरी में काम करने वाले अधिकांश मजदूरो में कई तरह की
एलर्जिस की जानकारी मिली क्योकि वो कॉटन बी टी कॉटन ही था । पर इस जानकारी को ज्यादा तूल नहीं दिया गया लेकिन इसे पुख्ता प्रमाण माना जाना चाहिए कि बी टी फ़सले स्वास्थ तथा पर्यावरण के लिए बिलकुल सुरक्षित नहीं है ।
हो सकता है जानकारी , व्याख्या तथा प्रमाणों में कुछ कमी रही हो, किन्तु इस आलेख के माध्यम से मैं अपनी आवाज़ उनसभी ब्लॉगर साथियों तक पहुचाना चाहती हूँ जो वाकई इस दिशा में बहुत कुछ करने का माद्दा रखते है । इस आलेख के माध्यम से आप सभी साथियों से पर्यावरण और हिन्दुस्तान के भविष्य को बचाने की गुहार करती हूँ ।

कुछ कीजिये .....

(अधिक जानकारी के लिए रेडिफ न्यूज़ या विकिपीडिया पर देख सकते है )


26 comments:

Arvind Mishra said...

वाह कितनी मौजू (मौज वाली नहीं बल्कि प्रासंगिक -कहीं होली के सरूर में लोग बाग़ मौजू को मौज वाली न समझ लें हा हा ) पोस्ट लिखी है आपने ...जो आपके समकालीन /तत्कालीन मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता को दर्शाती है -मैंने इस मुद्दे पर पिछले वर्ष लिखा था -


यहाँ

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपका चिन्तन सार्थक है!
चेतना का संचार करने वाले आलेख को प्रकाशित करने के लिए शुक्रिया!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...
This comment has been removed by the author.
डॉ. मनोज मिश्र said...

satya chintan.

गिरीश बिल्लोरे मुकुल अब पॉडकास्टर said...

zarooree report ke liye aabhar

Udan Tashtari said...

सार्थक चिन्तन...विचारणीय है पूरा विश्लेषण!

जी.के. अवधिया said...

"रासायनिक उर्वरक, केमिकल्स के प्रयोग ने जहाँ उत्पादन को बढाया वही दूसरी तरफ ढेरो नुकसान भी दिए है । मृदा की उर्वरकता तो कम हो ही गई रासायनिक तत्वों के प्रयोग से उत्पादन की गई फसलों में पोषक तत्वों की भी बहुत कमी आई है।"

सत्य कथन!

हिमांशु । Himanshu said...

बहुत ही सार्थक और सामयिक प्रविष्टि ।
आभार ।

दीपक 'मशाल' said...

Aaj sach me sarthak lekhan raha aapka.. main to soch hi rraha tha.. dekha to sabhi sarthak-sarthak jap rahe hain tippanee me.. :)

dr.aalok dayaram said...

करोडों ,अरबों का बीटी काटन बीज बनाने वाली कम्पनियां देश की सरकार में बैठे परले दर्जे के भ्रृष्ट राजनेताओं को आसानी से खरीद लेती हैं और ऐसे बीज अब पूरी तरह प्रचलित हो गये हैं। बाबा रामदेव के देश हितेशी चिंतन के मुताबिक इन नेताओं का स्विस बैंक में जमा धन कानूनी प्रक्रिया के तहत भारत लाकर देश के विकास में लगाया जाना आज की प्रमुख आवश्यकता है।

Mithilesh dubey said...

बहुत खूब दीदी , आपकी चिन्ता बिल्कुल जायज और सार्थक है , आंखे खोल देनी वाली पोस्ट रही आज आपकी ।

संजय भास्कर said...

सत्य कथन!

महफूज़ अली said...

बहुत ही प्रासंगिक.... समसामयिक... ज्ञान से भरी सुंदर पोस्ट...

sangeeta swarup said...

बहुत सार्थक पोस्ट है ...चिंतन तो किया जा सकता है पर जब सरकार ये सब करने पर आमदा हो तो आम जनता क्या कर पायेगी? आज हालात ये हैं की बिना मिलावट का खाना खाने पर लोग बीमार पड़ जायेंगे.....:):) विचारणीय विषय

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आज जैविक खाद के प्रयोग का हर गोष्ठी में शोर तो होता है...इसे प्रोत्साहन देने वालों की संख्या बहुत कम है.
इस दिशा में चिंतन के लिये बधाई

Kusum Thakur said...

विषय चिंतनीय है ......सार्थक प्रविष्टि !!

singhsdm said...

रानी जी चिंता वाजिब है..........बी टी पर ये जो विवाद चल रहा है...भूमंडलीकरण का ही किया धरा है.........अभी तो नहीं मगर देर सबेर समझ में आएगा तो कष्ट होगा.....सार्थक लेख के लिए आभार

ताऊ रामपुरिया said...

आपने बहुत ही सामयिक विषय पर कलम चाली है. असली समस्या यह है कि सभी इस बात को जानते भी हैं. पर हमारी सरकारें मल्टी नेशनल्स के हाथों की कठपुतलियां मात्र रह गई हैं. सब कुछ उनके इशारों पर होता है.

आखिर होगा वही जो मंजूरे मल्टीनेशनल्स होगा.

रामराम.

ताऊ रामपुरिया said...

भूल सुधार :-

चाली = चलाई

पढें.

रामराम.

arvind said...

सार्थक चिन्तन,सामयिक प्रविष्टि ,आभार ।

देवेश प्रताप said...

विचारणीय लेख .......प्रकृति से छेड़छाड़ करके इंसान अपने विनाश का कारण खुद ढूंढ रहा है .

डॉ टी एस दराल said...

विचारणीय विषय।
लेकिन कृषि वैज्ञानिकों का क्या कहना है , ये भी जानना ज़रूरी है।

DEEPAK said...

PAYAWARAN KE PRATI AAPKI CHINTA SWABHAWIK HAI. AAPKI IS SANWEDANSHILTA KO SALAAM!
---HOSHOHAWAS

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय रानी विशाल जी,

आदरणीय सुरेश चिपलूनकर जी की इस पोस्ट http://blog.sureshchiplunkar.com/2009/09/nestle-foods-gm-content-and-consumer.html पर की अपनी टिप्पणी को फिर एक बार यहाँ दोहरा रहा हूँ,

सर्व प्रथम तो धन्यवाद आपको यह मुद्दा उठाने के लिये क्योंकि इस संबंध में जानकारी के अभाव में यह मुद्दा हमारे किसानों व अन्य संगठनो् के लिये भावनात्मक मुद्दा बन सकता है।

आइये सिलसिले वार चर्चा करते हैं:-

१-जी एम फूड क्या है?
Q1. What are genetically modified (GM) organisms and GM foods?

उत्तर:- Genetically modified organisms (GMOs) can be defined as organisms in which the genetic material (DNA) has been altered in a way that does not occur naturally. The technology is often called “modern biotechnology” or “gene technology”, sometimes also “recombinant DNA technology” or “genetic engineering”. It allows selected individual genes to be transferred from one organism into another, also between non-related species.
Such methods are used to create GM plants – which are then used to grow GM food crops.

२-जी एम खाद्य की जरूरत क्यों है?
Q2. Why are GM foods produced?

उत्तर:-GM foods are developed – and marketed – because there is some perceived advantage either to the producer or consumer of these foods. This is meant to translate into a product with a lower price, greater benefit (in terms of durability or nutritional value) or both. Initially GM seed developers wanted their products to be accepted by producers so have concentrated on innovations that farmers (and the food industry more generally) would appreciate.

The initial objective for developing plants based on GM organisms was to improve crop protection. The GM crops currently on the market are mainly aimed at an increased level of crop protection through the introduction of resistance against plant diseases caused by insects or viruses or through increased tolerance towards herbicides.

Insect resistance is achieved by incorporating into the food plant the gene for toxin production from the bacterium Bacillus thuringiensis (BT). This toxin is currently used as a conventional insecticide in agriculture and is safe for human consumption. GM crops that permanently produce this toxin have been shown to require lower quantities of insecticides in specific situations, e.g. where pest pressure is high.

Virus resistance is achieved through the introduction of a gene from certain viruses which cause disease in plants. Virus resistance makes plants less susceptible to diseases caused by such viruses, resulting in higher crop yields.

Herbicide tolerance is achieved through the introduction of a gene from a bacterium conveying resistance to some herbicides. In situations where weed pressure is high, the use of such crops has resulted in a reduction in the quantity of the herbicides used.(जारी है)

प्रवीण शाह said...

आगे पढ़िये...

३-क्या जी एम खाद्य सुरक्षित हैं?
Q३. Are GM foods safe?

उत्तर:-Different GM organisms include different genes inserted in different ways. This means that individual GM foods and their safety should be assessed on a case-by-case basis and that it is not possible to make general statements on the safety of all GM foods.

GM foods currently available on the international market have passed risk assessments and are not likely to present risks for human health. In addition, no effects on human health have been shown as a result of the consumption of such foods by the general population in the countries where they have been approved. Continuous use of risk assessments based on the Codex principles and, where appropriate, including post market monitoring, should form the basis for evaluating the safety of GM foods.

उपरोक्त तीनों प्रश्न-उत्तर WHO की साइट से साभार


४-अब देखिये दुनिया में कहां कहां जी एम खाद्य उगाये जाते हैं?
उत्तर:- देखिये यह लिंक http://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/0/07/Gm_accept_map.png

५- चिकित्सक लोग क्या कहते हैं जी एम खाद्यों के बारे में?
उत्तर:-Present knowledge on GM food safety:-
A 2008 review published by the Royal Society of Medicine noted that GM foods have been eaten by millions of people worldwide for over 15 years, with no reports of ill effects.[5] Similarly a 2004 report from the US National Academies of Sciences stated: "To date, no adverse health effects attributed to genetic engineering have been documented in the human population."[1] A 2004 review of feeding trials in the Italian Journal of Animal Science found no differences among animals eating genetically modified plants.[6] A 2005 review in Archives of Animal Nutrition concluded that first-generation genetically modified foods had been found to be similar in nutrition and safety to non-GM foods, but noted that second-generation foods with "significant changes in constituents" would be more difficult to test, and would require further animal studies.[2] However, a 2009 review in Nutrition Reviews found that although most studies concluded that GM foods do not differ in nutrition or cause any detectable toxic effects in animals, some studies did report adverse changes at a cellular level caused by some GM foods, concluding that "More scientific effort and investigation is needed to ensure that consumption of GM foods is not likely to provoke any form of health problem".[7]

Worldwide, there are a range of perspectives within non-governmental organizations on the safety of GM foods. For example, the US pro-GM pressure group AgBioWorld has argued that GM foods have been proven safe,[8] while other pressure groups and consumer rights groups, such as the Organic Consumers Association,[9] and Greenpeace[10] claim the long term health risks which GM could pose, or the environmental risks associated with GM, have not yet been adequately investigated. They also claim that truly independent research in these areas is systematically blocked by the GM corporations which own the GM seeds and reference materials.
स्रोत:- विकिपिडिया

अब मेरा निष्कर्ष:
जेनेटिक इंजीनियरिंग से दवाइयां और वैक्सीन तथा हारमोन तो काफी समय से बनते हैं और कामयाब भी हैं रही बात खाद्यों की, हमें मानव जाति की सामूहिक समझ और ज्ञान पर विश्वास करते हुऐ इसे हौव्वा नहीं बनाना चाहिये,विषय विशेषज्ञों के आकलन को मानना चाहिये और यह भी समझना चाहिये कि GM foods के समर्थक मानव जाति के दुश्मन नहीं हैं, आखिर लगातार बड़ रहे खाद्य संकट का हल खोजने की सामर्थ्य है इस तकनीक में...

धन्यवाद!

'अदा' said...

bahut hi saarthak aalekh...hai aaj kaa...bahut hi accha likha hai tumne..Rani
yahan main Praveen shah ji ki baaton se sahmat hun...